भारत के संविधान की धज्जियाँ उड़ाते राजनैतिक दल


भारत आज एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में जाना जाता है । सैकड़ों वर्षों के गुलामी के पश्चात हमारा देश ब्रिटिश सम्राज्य के कुशासन से 15 अगस्त 1947 को मुक्त हुआ इस स्वतन्त्रता के लिये जिन भारतवासियों ने अपने प्राण न्योछावर किए , उनका सपना था कि हमारा देश स्वतन्त्र होकर पुनः अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा समृद्धि ऐश्वर्य वैभव गौरव व सम्प्रभूता को प्राप्त करेगा । जिसमें हमारी भावी सन्तति सुख-शान्ति के साथ रहते हुए अपना समुचित विकास सुनिश्चित करेगी । यहाँ का हर नागरिक ससम्मान जीवन यापन करने के लिए पूर्ण स्वतन्त्र होगा ।

स्वतंत्र या पार्टीतंत्र ।

आज हमारी स्वतन्त्रता का एक लम्बा सफर तय हो चुका है , इस समय काल में हमारे देश ने भौतिक क्षेत्र में अवश्य ही काफी प्रगति की है । सड़क , बिजली , पानी , रेल , वायुयान , जलपोत , उपग्रह , तथा गगनचुम्बी इमारते आदि भारत की नई पहचान बन चुकी है , परन्तु चकाचौंध करने वाला शहरीकरण , और इसके बिपरीत उजड़ते गाँव हमें अपने जीवन की मौलिकता और सपनों से दूर कर रहे हैं । हमारी यह अप्रत्याशित प्रगति मात्र कुछ लोगों को ही सम्पन्न बनाने में सार्थक हुई और अधिकांश लोगों की गरीबी का सबब ही बनी है ।
बर्तमान समय में भारत की जनसंख्या 150 करोड़ के आस पास पहूंच चुकी है जिसमें 5 प्रतिशत लोग अति सम्मानित , 10 प्रतिशत लोग सम्मानित और शेष 85 प्रतिशत लोग असम्मानित जीवन जीने के लिए विवश हैं । इन 85 प्रतिशत लोगों के अधिकांश भाग नित्य जीविका के लिए ही जूझ रहा है , जिन्हें मानक भोजन तो दूर ठीक से पेट भरने लायक भोजन भी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है । देश की आधी से ज्यादा आवादी अभी तक कुपोषण का शिकार है ।
एक जून की रोटी खाकर , जो संघर्षों से जूझ रहे हैं ।
आजादी कहते हैं किसको , खुद ही खुद से पूँछ रहे हैं ।।
इनके लिये आजादी वरदान न होकर एक अभिशाप बनकर रह गई है । आज लोगों के घरों के अन्दर भी सुरक्षा कठिन होती जा रही है । महिलाओं का सड़क पर निकलना भी दूभर हो गया है । राजनेता कहने वाले लोग जनमानस को जातिवाद , क्षेत्रवाद , भाषावाद , सम्प्रदायवाद आदि का पाठ पढ़ाकर आपस में ही लड़ा रहे हैं । वोट की राजनीति ने हिन्दूओं और मुसलमानों के बीच नफरत की दीवार खड़ी कर दी है । अगड़े पिछड़े ,और दलित समाज के बीच विषमता लगातार बढ़ रही है । लोकतंत्र के नाम पर नये नये राजनैतिक घराने बनते जा रहे हैं ।
मित्रों ज्ञात हो कि हमारा सवतन्त्रता आन्दोलन भारत केसामान्य लोगों के लिए सुशासन की स्थापना के लिये ही था । जिसमें भारत स्वतन्त्र हुआ और सुशासन की स्थापना के लिए संविधान बना , संविधान निर्माताओं ने भारत को एक लोकतन्त्रत्मक गणराज्य बनाने का संकल्प लिया , जिसके अन्दर नागरिक को राजनीति की सर्वोच्च उचाई के रूप में स्थापित किया गया ।
परन्तु क्या यह नागरिक वास्तव में उस राजनैतिक शक्ति का अधिकारी बन पाया ?
उत्तर स्पष्ट है कि नहीं ।
आज भारत की विषम परिस्थिति के मद्देनजर मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या हम वास्तव में आजाद हैं । और यदि आजाद है तो क्या यही आजादी संविधान में उल्लिखित है ? नहीं कदापि नहीं ;
मित्रों वास्तव में तो भारत की आजादी राजनैतिक दलों के द्वारा उसी तरह से अगवा कर लिया गया है जिस तरह पूर्व में ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा रियासतों की आजादी को अगवा कर लिया गया था । हमारी राजनैतिक शक्ति को हम तक पहुंचने ही नहीं दिया गया , हकीकत ये है कि हमारा संविधान अभी तक यथाविधि लागू ही नहीं किया गया , जिसके कारण नागरिकों की संवैधानिक शक्ति का लाभ आम लोगों तक पहुंच ही नहीं सका । 

आजादी किसकी हुई , गरीबों की या अमीरों की ।
इसी कारण से भारत के 85 प्रतिशत लोग ब्रिटिश शासन काल से भी बदतर स्थिति में शासकीय अत्याचार और उत्पीड़न सहन करने पर विवश हैं । हमारे देश को राजनैतिक दलों ने अंग्रेजों की तरह बाटो और शासन करो की नीति अपना कर शासन करना अपनी नियति बना लिया है । अपने इसी नीति के आधार पर पुरे देश के जनमानस को धार्मिक , साम्प्रदायिक , जातिय , कुजातिय , और क्षेत्रीय और भाषाई आधार पर बाट कर और बटे हुए वर्गों को संरक्षण और आरक्षण का आश्वासन देकर उनको अपना वोट बैंक बना लिया है । राजनैतिक दलों के इस दुष्चक्र से हम सब भारतवासी उनके छद्म राजनैतिक मकड़जाल में फंसकर अपनी स्वतन्त्रता के लिये तड़प रहे हैं ।
शासन और प्रशासन के स्तर पर छोटे छोटे कार्यों के लिये हमें रोज दुत्कारा जाता है , हर जगह रिश्वत मांगी जाती है , और न देने पर अनावश्यक प्रताड़ित किया जाता है ।सामान्य तौर पर अपने सम्मान की रक्षा के लिये दर दर भटकना पड़ता है । कार्यपालिका से लेकर न्यायपालिका तक देश की दुर्दशा और स्वतन्त्र भारत के नागरिकों की ब्यथा पर मौन है ।
वास्तव में देखा जाए तो वर्तमान शासकीय ब्यवस्था अंग्रेजों द्वारा स्थापित कुशासन को भी मात दे रहा है ।जबकि
हमारा स्वतन्त्रता आन्दोलन अंग्रेजों की भ्रष्ट और अत्याचारी शासन ब्यवस्था को समाप्त कर सुशासन स्थापित करने के लिये था ।
आखिर कौन है इसका जिम्मेदार ।
इसका जिम्मेदार केवल और केवल हमारा मौन और अज्ञानता है , हमारा मौन भ्रष्टाचारियों को मजबूती प्रदान करता है , जिससे वो निरंकुश होते जाते हैं ।और आज इसी मौन और अज्ञानता के कारण हमारी राजनैतिक ब्यवस्था पुरी तरह से भ्रष्ट हो गई है । इस दुर्व्यवस्था के जनक हमारे राजनेता और राजनीति के नाम पर उनके द्वारा संगठित गिरोह यानि कि राजनैतिक दल हैं ।

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