भारत के संविधान की धज्जियाँ उड़ाते राजनैतिक दल
स्वतंत्र या पार्टीतंत्र ।
आज हमारी स्वतन्त्रता का एक लम्बा सफर तय हो चुका है , इस समय काल में हमारे देश ने भौतिक क्षेत्र में अवश्य ही काफी प्रगति की है । सड़क , बिजली , पानी , रेल , वायुयान , जलपोत , उपग्रह , तथा गगनचुम्बी इमारते आदि भारत की नई पहचान बन चुकी है , परन्तु चकाचौंध करने वाला शहरीकरण , और इसके बिपरीत उजड़ते गाँव हमें अपने जीवन की मौलिकता और सपनों से दूर कर रहे हैं । हमारी यह अप्रत्याशित प्रगति मात्र कुछ लोगों को ही सम्पन्न बनाने में सार्थक हुई और अधिकांश लोगों की गरीबी का सबब ही बनी है ।बर्तमान समय में भारत की जनसंख्या 150 करोड़ के आस पास पहूंच चुकी है जिसमें 5 प्रतिशत लोग अति सम्मानित , 10 प्रतिशत लोग सम्मानित और शेष 85 प्रतिशत लोग असम्मानित जीवन जीने के लिए विवश हैं । इन 85 प्रतिशत लोगों के अधिकांश भाग नित्य जीविका के लिए ही जूझ रहा है , जिन्हें मानक भोजन तो दूर ठीक से पेट भरने लायक भोजन भी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है । देश की आधी से ज्यादा आवादी अभी तक कुपोषण का शिकार है ।
एक जून की रोटी खाकर , जो संघर्षों से जूझ रहे हैं ।
आजादी कहते हैं किसको , खुद ही खुद से पूँछ रहे हैं ।।
इनके लिये आजादी वरदान न होकर एक अभिशाप बनकर रह गई है । आज लोगों के घरों के अन्दर भी सुरक्षा कठिन होती जा रही है । महिलाओं का सड़क पर निकलना भी दूभर हो गया है । राजनेता कहने वाले लोग जनमानस को जातिवाद , क्षेत्रवाद , भाषावाद , सम्प्रदायवाद आदि का पाठ पढ़ाकर आपस में ही लड़ा रहे हैं । वोट की राजनीति ने हिन्दूओं और मुसलमानों के बीच नफरत की दीवार खड़ी कर दी है । अगड़े पिछड़े ,और दलित समाज के बीच विषमता लगातार बढ़ रही है । लोकतंत्र के नाम पर नये नये राजनैतिक घराने बनते जा रहे हैं ।
मित्रों ज्ञात हो कि हमारा सवतन्त्रता आन्दोलन भारत केसामान्य लोगों के लिए सुशासन की स्थापना के लिये ही था । जिसमें भारत स्वतन्त्र हुआ और सुशासन की स्थापना के लिए संविधान बना , संविधान निर्माताओं ने भारत को एक लोकतन्त्रत्मक गणराज्य बनाने का संकल्प लिया , जिसके अन्दर नागरिक को राजनीति की सर्वोच्च उचाई के रूप में स्थापित किया गया ।
परन्तु क्या यह नागरिक वास्तव में उस राजनैतिक शक्ति का अधिकारी बन पाया ?
उत्तर स्पष्ट है कि नहीं ।
आज भारत की विषम परिस्थिति के मद्देनजर मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या हम वास्तव में आजाद हैं । और यदि आजाद है तो क्या यही आजादी संविधान में उल्लिखित है ? नहीं कदापि नहीं ;
मित्रों वास्तव में तो भारत की आजादी राजनैतिक दलों के द्वारा उसी तरह से अगवा कर लिया गया है जिस तरह पूर्व में ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा रियासतों की आजादी को अगवा कर लिया गया था । हमारी राजनैतिक शक्ति को हम तक पहुंचने ही नहीं दिया गया , हकीकत ये है कि हमारा संविधान अभी तक यथाविधि लागू ही नहीं किया गया , जिसके कारण नागरिकों की संवैधानिक शक्ति का लाभ आम लोगों तक पहुंच ही नहीं सका ।
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